शहीद होने के पचास से ज्यादा वर्षों बाद आज भी सैनिक की आत्मा कर रही ड्यूटी।

शहीद होने के पचास से ज्यादा वर्षों बाद आज भी सैनिक की आत्मा कर रही ड्यूटी

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

गंगटोक – भारत माता के सपूत शहीद पंजाब रेजिमेंट के जवान कैप्टन हरभजन सिंह ऐसे वीर सैनिक हैं, जिनका शरीर छूटने के बाद भी देशप्रेम नहीं छूटा। शहीद होकर भी उनकी आत्मा पांच दशकों से अधिक समय से आज भी देश की रक्षा करती रहती है। सैनिकों का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा , चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है। चीनी सैनिक भी इस बात पर खूब विश्वास करते हैं , क्योंकि उन्होंने भी कैप्टन बाबा हरभजन सिंह को शहीद होने के बाद भी घोड़े पर सवार होकर सरहदों की गश्त करते हुये देखा है। बताया जाता है कि जब भी भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच किसी मामले को लेकर बैठक होती हैं तो हरभजन सिंह के लिये एक कुर्सी अलग से लगायी जाती है। उनका मानना है की इस मीटिंग में हरभजन सिंह भी आते है और मीटिंग का हिस्सा होते है। भारतीय सेना के जवान उन्हें “नाथुला के नायक” के रूप में याद करते हैं और उन्होंने उनके सम्मान में एक मंदिर बनाया है , यहां तक कि उन्हें “बाबा” की उपाधि प्राप्त है। हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को जिला कपूरथला जिले के ब्रोंदल नामक ग्राम में हुआ था , जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल से प्राप्त की थी। मार्च 1955 में उन्होंने ‘डी.ए.वी. हाईस्कूल’, पट्टी से मेट्रिकुलेशन किया था। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने अपनी यूनिट के लिये महत्त्वपूर्ण कार्य किया। इसके बाद उनका स्थानांतरण ’18 राजपूत रेजिमेंट’ के लिये हुआ। वे वर्ष 1966 में पंजाब रेजिमेंट की 24वीं बटालियन में भर्ती हुये थे। उन्हें देश की सेवा करते हुये सिर्फ दो ही साल हुये थे कि एक दुर्घटना में वे शहीद हो गये। सेना के जवानों द्वारा बताये जाने के अनुसार 04 अक्टूबर 1968 को जब हरभजन सिंह खच्चरों पर सेना का सामान लादकर ला रहे थे तभी एक ग्लेशियर ढहने से वे शहीद हो गये , जिन्हें बाद में महावीर चक्र भी दिया गया। शहीद होने के दो दिन तक उनका कहीं पता नहीं चला था। बताया जाता है कि जब दो दिन तक उनकी लाश नहीं मिली तो अपने साथी के सपने में आकर उन्होंने बताया कि उनका शव कहां दबा हुआ है ? अगले दिन ठीक उसी स्थान से उनका शव बरामद किया गया , जहां उन्होंने बताया था। इसके बाद उनके शव की पहचान की और उनका अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार तो इस बहादुर सैनिक के शरीर का हुआ था , इनकी आत्मा तो जीवित थी और देश की सीमा पर तैनात रहती थी। कुछ ऐसी घटनायें घटने लगीं कि इनके साथियों और सीनियर्स को इन्हें जीवित मानते हुये इनकी सारी सेवायें जारी रखनी पड़ी। इनका बंकर , इनकी वर्दी , इनकी ड्यूटी , इनकी छुट्टियां , इनकी तैनाती और इनकी सैलरी। सब पहले की तरह जारी रखा गया , जैसा इनके शरीर छोड़ने से पहले रहता था। शहीद सैनिक हरभजन की आत्मा को लेकर जैसे-जैसे लोगों में आस्था बढ़ी उनका एक मंदिर बनवाया गया। ये मंदिर हरभजन सिंह के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच , 13000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर में उनकी फोटो और कुछ सामान रखा है। लोगों का मानना है कि हरभजन आज भी सीमा पर ड्यूटी देते हैं। आज यहां दूर-दूर से लोग दर्शन के लिये भी आते हैं। सेना के जवानों सहित यहां से गुजरने वाला हर व्यक्ति बाबा हरभजन सिंह की समाधि पर रुकता है और उनका आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ता है।सेना में उनके लिये एक कमरा अलग से दिया हुआ है , उस कमरे की रोज सफाई होती है। हर रोज इनकी वर्दी पर प्रेस और जूतों पर पालिश होता है। हैरान करने वाली बात यह है कि हर शाम को इन जूतों पर कीचड़ या धूल लगी मिलती है , वर्दी गंदी होती है और सुबह के समय बिस्तर में सलवटें होती हैं , जैसे वे अभी सोकर उठे हैं। जब हरभजन सिंह की छुट्टियों का समय आता था , तब सेना की तरफ से उनका ट्रेन में रिजर्वेशन किया जाता था और उनके दो साथी उनके सामान को उनके पैतृक घर में छोड़कर आते थे। ऐसा कहा जाता है कि वे अपनी इच्छायें अपने साथियों के साथ उनके सपने में आकर साझा करते थे। जानकारी के मुताबिक जिस समय बाबा को छुट्टियां मिलती थीं , उस समय अब स्थानीय लोग उनके सम्मान में उत्सव का आयोजन करने लगे हैं। इसलिये अब बाबा छुट्टी पर नहीं जाते और पूरे साल यहीं अपने बंकर में रहते हैं। सेना ज्वॉइन करने के बाद यहां आने वाले फौजी सबसे पहले बाबा से आशीर्वाद लेने जाते हैं। जब किसी को कोई समस्या होती है तो वे अपनी समस्या बाबा से साझा भी करते हैं। आस्था है कि बाबा उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं।

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